श्योपुर जिला शिक्षा विभाग में बढ़ता भ्रष्टाचार
श्योपुर<><><><><><>उमेश सक्सेना<><> <><><><> 25 जुलाई 2009 मध्यप्रदेश शासन ने केन्द्रीय शिक्षा बोर्ड के पेटर्न पर ही प्रदेश का शैक्षणिक केलेन्डर की घ्ाोषणा पिछले वर्ष की थी जिसके अनुसार शिक्षण सत्र 1 अपे्रल से मार्च तक कर दिया गया है । नवीन शिक्षा सत्र ं अपे्रल से ही शुरू हो गया, बीच में मई और जून माह में ग्रीष्मावकाश के बाद पुन: जुलाई से प्रारंभ हो जाता है ।
माध्यमिक शिक्षा मण्डल भोपाल ने जुलाई माह में प्रदेश के सभी अशासकीय हाईस्कूल एवं हायर सेकेन्ड्री स्कूलों की मान्यता जारी कर दी है । परन्तु श्योपुर जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय ने अभी तक जिले के प्राथमिक एवं माध्यमिक स्तर तक के अशासकीय विद्यालयों की मान्यता सूची जारी नही की है । जुलाई माह समाप्त होने को है और अभी तक निरीक्षणकर्त्ता शालाओं का निरीक्षण करके विद्यालयों की फाइलें जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में जमा नही कर पाए है ।
कई निरीक्षण अधिकारियों ने तो निरीक्षण फाइलें विद्यालयों से सेवा शुल्क प्राप्त नही होने के कारण डीईओ कार्यालय में जमा नही कराई और विद्यालयों को धौंस और दी गई कि अगर सेवा शुल्क प्रति फाइल एक हजार रूपए नही दिए गए तो विद्यालय के पात्र छात्र/छात्राओं को छात्रवृत्ति से वंचित रहना पडेगा जिसकी जिम्मेदारी विद्यालय की ही होगी ।
मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान प्रदेश को भ्रष्टाचार मुक्त प्रदेश बनाना चाहते हैं परन्तु इससे अलग हटकर श्योपुर जिले में पदस्थ अधिकारी इस जिले को भ्रष्टाचार युक्त बनाने पर तुले हुए है । प्रदेश से भ्रष्टाचार को हटाने के उद्देश्य को लेकर ही माध्यमिक शिक्षा मण्डल ने प्रति वर्ष अशासकीय हाईस्कूल एवं हायरसेकेन्ड्री स्कूलों की मान्यता का नवीनीकरण की प्रक्रिया को एक वर्ष से बढाकर तीन वर्ष के लिए कर दी है । इसी प्रकार सन् 1994 में कक्षा 1 से लकर 4 तक की कक्षा चलाने के लिए अशासकीय स्कूलों की मान्यता की आवश्यकता नही होगी इस प्रकार के आदेश जारी किए गए थे ।
जिले में शिक्षा विभाग के भ्रष्टाचार का आलम यह है कि अशासकीय विद्यालय अपनी मनमानी करने पर तुले हुए हैं । अधिकारियों को उनका सेवा शुल्क प्राप्त हो जाता है तो कहाँ क्या अनियमितताऐं हैं देखने की आवश्यकता ही नही समझते है । अशासकीय विद्यालयों का आलम यह है कि बिना टी0सी0 के किसी भी कक्षा में बच्चे का एडमीशन कर लिया जाता है , जबकि नियम यह है कि कक्षा तीन चार के बाद बिना टी0स्ाी0 के किसी भी में एडमीशन नही किया जाना चाहिए ,परन्तु बच्चे के अभिभावक टी0सी0 लाये या नही जिस कक्षा में चाहें उस कक्षा में बच्चे का एडमीशन हो जाता है । आलम यह है कि आठवीं फेल बच्चे को भी कक्षा 9 में एडमीशन मिल जाएगा ।
माध्यमिक शिक्षा मंउल ने श्योपुर जिले के 28 अशासकीय हाईस्कूल और हायर सेकेन्ड्री स्कलों को मान्यता प्रदान की है । परन्तु जिले मुख्यालय में ही कई माध्यमिक विद्यालय ऐसे हैं जिनको कक्षा 8 तक ही विद्यालय चलाने की मान्यता जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय से प्राप्त हैं परन्तु कक्षा 9 और कक्षा 10 वीं की कक्षाऐं संचालित कर रहे हैं और तब कोई अधिकारी जाँच के लिए आता है तो उसे यह कहकर कि कक्षा 9 एवं 10 की कोचिंग क्लासेस चलाते हैं और इा बच्चों का एडमीशन किसी भी मान्यता प्राप्त स्कूलों मे नाम लिखा दिया जाता हैं । अगर मान्यता प्राप्त हाईस्कूलों और हायरसेकेन्ड्री स्कूलों की सूक्ष्मता से जाँच की जाए तो पता चल जाएगा कि जितने बच्चों का एडमीशन बताया गया हैं उतने बच्चे उस विद्यालय में आ रहे या नही और नही आ रहे हैं तो किस कारण से नहीे आ रहे हैं , और उन विद्यालयों में जहाँ कोचिंग के नाम से विद्यालय समय में कक्षा 9 वीं एवं 10 वीं के छात्रों को पढाया जा रहा हैं उनसे पूछा जाए कि तुम लोगों के एडमीशन कहाँ हैं तो स्थिति साफ हो जाएगी । अधिकारियों को सेवा शुल्क पहुँच जाने के कारण ही माध्यमिक तक मान्यता प्राप्त जिले के विद्वालय कक्षा 9 एवं 10 तक बच्चों को कोचिं्र के नाम से पढा रहे हैं । इनकी जाँच करना आवश्यक हैं ।
इसी सेवा शुल्क की प्रथा के चलते शासन के नियमों की धज्जियां उडाई जाती हैं । अशासकीय स्कूलों में मध्यप्रदेश पाठ्य पुस्तक निगम द्वारा प्रकाशित पुस्तके चलाना अनिवार्य हैं ,परन्तु कमीशन के चर में प्राइवेट विद्यालय शिक्षा विभाग की नाक के तले इन पुस्तकों को न चलाते हुए निजी प्रकाशकों की किताबों बच्चों को दिलाने के लिए पालकों को कहते हें और किताबे भी इतनी कि बच्चों के बजन से अधिक बच्चों के बस्तों का वजन लाद कर ले जाना पडता है और आलम यह कि किताबें इतनी अधिक होती हैं कि बच्चे साल भर में भी उन किताबों को पूरी खोल भी नही पाते पढने की बात तो दूर रही । शिक्षा विभाग की यह अनदेखी सिर्फ अशासकीय विद्यालयों से मिलने वाले सेवा शुल्क की वजह से ही है ।