Friday, April 24, 2009

श्योपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रश्नचिन्ह ?

श्योपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रश्नचिन्ह ?
श्योपुर <><><> उमेश सक्सेना<><><> श्योपुर जिला मुख्यालय के ग्रामीण क्षेेत्रों के अधिकतर शासकीय प्रायमरी एवं माध्यमिक विद्यालयों का यदि निरीक्षण किया जाये तो स्कूलों की स्थिति शासन के नियम कायदों एवं शिक्षा नीति के बिल्कुल विपरीत मिलेगी ।
ग्रामीण क्षेत्रों के अनेंक शासकीय शिक्षण संस्थाऐं ऐसी मिलेगी जहाँ एक सैकडा से अधिक बच्चों पर एक या दो ही शिक्षक उन्हे अध्यापन करा रहे है , और कई शासकीय विद्यालय ऐसे है जहाँ 67 बच्चों को 4-4 अध्यापक पढा रहे हैं । अब ऐसी स्थिति में शिक्षक उन्हे कैसे और कितना पढा पाते हैं यह तो अध्ययनरत छात्र,छात्राऐं या उनके अभिभावक ही बता सकते हैं । दसरी ओर शिक्षकों की स्थिति देखें तो पता चलेगा कि ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक अध्यापक/अध्यापिकाऐं ऐसे हैं जिन्हे 10 से 20 वर्ष ग्रामीण क्षेत्रों में अध्यापन कराते हुए हो गए है ।
मध्यप्रदेश की शिक्षा नियमों के अनुसार अगर देखा जाए तो 40 बच्चों पर एक शिक्ष्क की पदस्थी होना चाहिए , परन्तु इसके विपरीत शासकीय कन्या प्राथमिक विद्यालय दातारदां में 107 बच्चों के नाम दर्ज ळैं और कु0 रितु गोयल, श्रीमती मीरा बघ्ोल, श्री ओम प्रकाश राय अध्यापक पदस्थ है । यहां कोई प्रधानाध्यापक नहीं है अगर वो होता तों यहाँ 107 बच्चों पर 4 अध्यापक हो जाते जबकि यहां सिर्फ 2 अध्यापक ही काफी थे ।
इसी प्रकार
शासकीय बालक प्राथमिक विद्यालय दातारदां में सिर्फ 67 बच्चों के नाम पंजी रजिस्टर मं दर्ज हैं और श्री शम्सुद्दीन कुर्रेशी प्रधानाध्यपक , हीरालाल रावत , रामसिंह रावत, हनुमान जांगिड पदस्थ हक् जबकि यहां भी दो अध्यापकों से ही अध्यापन कार्य करवाया जा सकता है । यहां यह भी उल्लेखनीय है कि शासकीय बालक प्राथमिक विद्यालय में अध्यापक
:तो चार हैं तरन्तु अध्यापन का कार्य एक या दो शिक्षक करवा पाते हैं क्योकि इसमें से एक अपनी निजी चिकित्सीय पे्रक्टिस भी करते हैं जिसके चलते विद्यालय की ओर ध्यान नही दे पाते क्योंकि शासन की ओर से जो वेतन प्राप्त होता है वह तो ब्याज है असल में तो ग्रामीणें का इलाज करके जो रूपया प्राप्त होता हे वही असली कमाई है । एक अन्य शिक्ष्क सामरसा गांव में रहकर अन्य कार्य करते है जब उससे फुरसत मिल गई तो स्कूल आ जाते हें बाकी बचे शिक्षक यदा कदा बच्चों को पढा ही देते है ।
स्कूल शिक्षा विभाग के इस प्रकार के नियम भी आ चुके हैं कि जहाँ एक ही जगह और पास पास कन्या और बालक प्रायमरी विद्यालय अलग अलग हैं उन विद्यालयों को एक ही विद्यालय में मिलाकर दोनो विद्यालयों के छात्र/छात्राओं के मान से शिक्षक की पदस्थापना करके बचे हुए शिक्षकों को अन्यत्र भेज दिया जाए । जिससे जिन विद्यालयों में छात्रों की संख्या अधिक और अध्यापकों की संख्या कम हैं वहां सही तरीके से अध्यापन कार्य करवाया जा सकता है ।
श्योपुर जिले का ही एक ग्राम सौभागपुरा हैं जहाँ शासकीय प्रायमरी एवं माध्यमिक विद्यालय में कुल छात्र-छात्राओं की संख्या 145 दर्ज है जिस पर मात्र एक ही शिक्षक बलराम आदिवासी पदस्थ है, विद्यालय के शेष दो शिक्षकों मे से एक देवकीनंदन शर्मा यहों से बाहर जा चुके हैं तथा दूसरे शिक्षक दिनेश सगर डीपीसी कार्यालय कलेक्ट्रेड भवन जिला श्योपुुर की निर्माध शाखा में पदस्थ हैं । जिन्हे इसी शाखा से तात्कालीन जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्री चन्द्रशेखर बोरकर ने लापरवाही के चलते निलम्बित कर दिया था, किन्तु इसके बावजूद उक्त शिक्ष्क को इसी निर्माण शाखा पर बहाल करते हुए पदस्थ किया गया है । जबकि शासन की ओर से संलग्नीकरण के प्रावधान समाप्त कर दिये गए हैं ।
ऐसी स्थिति में यदि डीपीसी कार्यालय को किसी कर्मचारी की आवश्यकता भी है तो दन विद्यालयों से शिक्षक संलग्न किये जाने चाहिए जहां सरप्लस में अध्यापक पदस्थ हैं ।
जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की गुणवत्ता को बढाने के लिए विचार एवं मंथन किया जाये कि आखिर यह कौन सी शिक्षा नीति के तहत शासन की व्यवस्थाऐं संचालित हैं अव्यवस्था को दुरूस्त करके किस किस प्रकार शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने की जिम्मेदारी किसकी है ।

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